19 October 2017

WISDOM ------- अहंकारी की प्रगति जितनी तीव्र होती है , उसका पतन उससे भी अधिक तेज होता है l

    रावण  का  मरा  हुआ  शरीर  पड़ा  था  l  उसमे  सौ  स्थानों  पर  छिद्र  थे  l  सभी  से  लहु  बह  रहा  था  l  लक्ष्मणजी  ने  राम  से  पूछा ----- ' आपने  तो  एक  ही  बाण  मारा   था  ,  फिर  इतने  छिद्र  कैसे  हुए   ? ' 
  भगवान  ने  कहा ---- ' मेरे  बाण  से  तो  एक  ही  छिद्र  हुआ  l  पर  इसके  अपने  कुकर्म   घाव  बनकर   अपने  आप  फूट  रहे  हैं   और  अपना  रक्त  स्वयं  बहा  रहे  हैं   l  

18 October 2017

WISDOM

  रावण  ने   कुटनीतिक  चाल  चली  -- बोला    --- अंगद  ! जिस  राम  ने  तेरे  पिता  को  मारा  ,  तू  उन्ही  की  सहायता  कर  रहा  है  l  मेरे मित्र  का  पुत्र   होकर  भी  तू  मुझसे  वैर कर  रहा  है  l  '
  अंगद  हँसा  और  बोला  ---- " रावण !  अन्यायी  से  लड़ना  और उसे  मारना  ही  सच्चा  धर्म  है  l  चाहे  वह  मेरा  पिता  हो   अथवा  आप  ही  क्यों  न  हों  l "
  अंगद  के  ऐसे  तेजस्वी  शब्द  सुनकर   रावण  को  उत्तर    देते  न  बना  l
   ' सम्बन्ध  नहीं ,  नीति  और  न्याय  का  पक्ष   ही  वरेण्य  है  l  :                                                                   



16 October 2017

WISDOM ------ जीवन के प्रति सकारात्मक द्रष्टिकोण रखें

    यदि  कोई  अपने  जीवन  में  कुछ  करने  की  ठान  ले ,  तो  उम्र  उसके  कार्य  में  बाधा  नहीं  बनती   और  शरीर  की  उर्जा  उसके  कार्य  में  रूकावट  नहीं  डालती   क्योंकि  उसका  निश्चय  मन  से  होता  है  , मन  की  शक्ति  से  होता  है  l  इसलिए  हर  रूकावट  को , हर  मुश्किल  व  परेशानी  को   उसके  आगे  झुकने  के  लिए  मजबूर  होना  पड़ता  है  l  इसी  मन  की  शक्ति  के  कारण   लियोनार्डो   दि  विन्ची  ने   अपनी  प्रसिद्ध  पेंटिंग   ' मोनालिसा '  51  साल  की  उम्र  में  बनाई  और  यह  उनके  जीवन  में  सबसे  अधिक  प्रशंसित  हुई  l
                 इसी  प्रकार  प्रखर  व्यक्तित्व  नेल्सन  मंडेला   अपने  जीवन  में  लम्बा   संघर्ष  करते  रहे   और  75  साल  की  उम्र   के  बाद  दक्षिण  अफ्रीका  के  राष्ट्रपति  बने   l
   इसी  प्रकार  भारतीय  संस्कृति के   प्रसिद्ध  संवाहक   गोस्वामी  तुलसीदास  जी  ने   भी  90  वर्ष  की  उम  में  रामचरितमानस   को  लिखना  प्रारंभ  कर    दिया  था   l
  जिन्दगी  को  बेहतर  बनाने  की  संभावना  सदैव  होती  है ,  बस , हमें  इस  और  बढ़ने  की  जरुरत  है   l 

15 October 2017

WISDOM ------ शिक्षा एक शक्ति है उसका सदुपयोग करें l

 आज  ज्ञान - विज्ञान  में  अग्रणी  रूस  की  प्रमुख  शक्ति  वहां  के  प्रत्येक  नागरिक  का  शिक्षित  होना  है  l   1920  से  पूर्व   रूस  में  निरक्षरता  की  स्थिति  भयावह  थी  , किन्तु  राज्य  सत्ता  का  हस्तांतरण  होते  ही   निरक्षरता  को   मिटाने  के  लिए  अथक  प्रयत्न  किये  गए  l  देश  के  कोने - कोने  में  निरक्षरता  उन्मूलन  केंद्र  खोले  गए  l  हर  शिक्षित  व्यक्ति  ने  प्रत्येक  अनपढ़  को  पढ़ाने - लिखाने  का  संकल्प  लिया  l  उस  वक्त  वहां  के  70  प्रतिशत  पुरुष  और   90  प्रतिशत  महिलाएं  अशिक्षित  थीं  l   71  जन जातियों  में  से  40  जातियां  ऐसी  थीं  जिनकी  कोई  भाषा  नहीं  थी  ,  उन्हें  शिक्षित  करना  बहुत  बड़ी  जिम्मेदारी  थी  l   इन  लोगों  के  लिए  भाषा  का  निर्माण  हुआ , जगह - जगह  स्कूल  खोले  गए  l  करोड़ों  की  संख्या  में  प्रौढ़  अशिक्षितों  को  पढ़ाने  के  लिए     स्वयं  सेवी  शिक्षकों  को   भावनात्मक  स्तर  पर  तैयार  किया  गया  l प्रत्येक   साक्षर  एक  निरक्षर  को  पढ़ाये ----- यह  रुसी साक्षरता अभियान  का  प्रमुख  नारा  था  , जिसे  पूर्ण  करना  प्रत्येक  नागरिक  का  राष्ट्रीय  दायित्व  था  l  इसके  परिणाम स्वरुप  192 0  से  1940  के  मध्य   पांच  करोड़  अनपढ़ों  को  साक्षर  बना  दिया   l   1970  तक   99.8  प्रतिशत  पुरुष  और   99 .7  प्रतिशत  महिलाएं  शिक्षित  हो   गईं  l
  लेनिन  का  नारा  था ---- पढ़ो   !  पढ़ो  !  पढ़ो  !   इसे  वहां  के  नागरिकों  ने  सत्य  करके  दिखाया  l                                                                                                                                       

14 October 2017

WISDOM -

 '   इस  संसार  में  कोई  अजेय  नहीं  है  l  काल  किसी  को  क्षमा  नहीं  करता  l  दुराचारी  चाहे  कितना  बलवान , शक्तिवान  क्यों  न  हो  , एक  दिन  उसका  दर्दनाक  अंत  होना  सुनिश्चित  है   l  शक्ति  का  दंभ  भी  तब  तक  है  , जब  तक  पुण्य  शेष  हैं  l  पुण्य  के  क्षीण  हो  जाने  पर   सारा   दंभ   गुब्बारे  की  हवा  की  तरह    निकल  जाता  है   और    बच   जाता   शक्ति  के बल  पर   किया  गया  घोर  पाप   l  मनुष्य  अपने  ही  नीच  कर्मों  द्वारा  अपने   ही  पुण्य  भंडार  का  क्षरण  कर  लेता  है   l '

13 October 2017

महात्मा गाँधी विचार देने से ज्यादा विचारों को जीवन में उतारने के हिमायती थे l

   बीस   वर्ष  के   दक्षिण  अफ्रीकी  प्रवास  के  बाद   वे  हिन्दुस्तान  लौटे    l  अपने  गुरु  गोपालकृष्ण  गोखले  की  सलाह  पर   वे  वर्ष  भर  राजनीतिक  रूप  से  मौन  रहे   और  उन्होंने  सम्पूर्ण  भारत  का  भ्रमण  किया  l   इस  यात्रा  के  जरिए  वे  समाज  के  अंतिम  जन  तक  पहुंचना  चाहते  थे  और  पहुंचे  भी  l
  उनका  पहला  राजनीतिक  भाषण  उस  समय  हुआ  जब  1916  में  बनारस  हिन्दू  विश्वविद्यालय  के  शिलान्यास  कार्यक्रम  में   देश  भर  से  बड़े - बड़े  लोगों  को  बुलाया  गया  था ,  जिनमे  बड़े - बड़े  राज्यों  के  महाराज , अन्य  रियासतों  के  राजा , बड़े  व्यापारी   व  राजनीतिज्ञ  शामिल  थे  l  इस  कार्यक्रम  में  वायसराय  को  भी  बुलाया  गया था  l  गांधीजी  को  भी  इस  कार्यक्रम  में  सम्मिलित  होने  का   न्योता  मिला  था  l
  जब  गांधीजी  के  सामने   उपस्थित  व्यक्तियों  को  संबोधित  करने  की  बारी  आई   तो  उन्होंने  कहा  ---- " मुझे  यहाँ  आने  में  देर  लगी  , समय  पर  नहीं  पहुँच  पाया  क्योंकि  शहर  की  इतनी  किलेबंदी  की  गई  थी  कि   सुरक्षा  की  वजह  से   यहाँ  पहुँचने  में  देर  लगी  l  "    उन्होंने  सवाल  उठाया  कि  यदि  देश  का  वायसराय  जो  संप्रभु  है  ,  उसको  अपनी  प्रजा  से  इतना   डर   लगता  है    तो  इससे  अच्छा  है  कि  वह   न  रहे  l  फिर  उन्होंने   सभा  में   भव्यता  के  साथ  पहुंचे  राजा - महाराजाओं  को  आड़े  हाथों  लिया   और  कहा  कि  , ' आप  तो  जनता  की  तिजोरी  में   जितना  सोना - चांदी  और  आभूषण  है  , उसे  अपने  शरीर  पर  लाद  कर  चले  आये  हैं   l  आखिर  यह  किसकी  कमाई  है  ?
 उनके  प्रश्न  जन सामान्य  के  प्रश्न  थे   l  

12 October 2017

विचार क्रान्ति से ही सम्पूर्ण क्रांति संभव ------ लोकनायक जयप्रकाश नारायण

  निष्ठावान - राष्ट्रवादी   जयप्रकाश  नारायण  अपने  छात्र  जीवन  से  एक   जुझारू  स्वाधीनता  सेनानी  थे   l  मौलाना  अबुल  कलाम  आजाद  की   इन  पंक्तियों  ने  उनके  अंतर्मन  में  क्रांति  की  ज्वाला  भड़का  दी ----  " नौजवानों  !  अंग्रेजी  शिक्षा  का  त्याग  करो   और  मैदान  में  आकर   ब्रिटिश  हुकूमत  की  ढहती  दीवारों  को  धराशायी  करो  और  ऐसे  हिंदुस्तान  का  निर्माण  करो  ,  जो  सारे  आलम  में  खुशबू  पैदा  करे  l  "
            राष्ट्रीय  स्वाधीनता  के  लिए  उन्होंने  हर  कष्ट  सहे ,  अनेकों  बार  जेल  गए  l  इस  कार्य  में  बराबर  की  भागीदारी  निभाई  उनकी  पत्नी  प्रभावती  देवी  ने  l    गांधीजी  के  लिए  प्रभावती  अपनी  लाड़ली  बेटी  की  तरह  थीं   l  उनके  विवाह  में  गांधीजी  ने  अभिभावक  की  भूमिका  निभाई  थी  l  1947   में  देश  की  आजादी  के  बाद   उन्हें  सरकार  में  गृह राज्य मंत्री  बनाये  जाने  का  प्रस्ताव  था  ,  परन्तु  उन्होंने  स्पष्ट  रूप  से  मना  कर  दिया  l 
  परम पूज्य  गुरुदेव  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  ने  कहा  था ---- " इस  महान  लोकनायक  का  साथ  देने  के  लिए   आध्यात्मिक  शक्तियां  भी   कटिबद्ध  एवं  संकल्पित  हैं   l "   जब  8  अक्टूबर  1979  को  उनका  देहावसान  हुआ   तब   गुरुदेव  ने    कहा ----- " मैं  यह  स्पष्ट  कहता  हूँ  , भारत  देश  जयप्रकाश  जी  को   त्याग - तपस्या  के  प्रतीक  और   जनहित  के  लिए  सर्वस्व  निछावर   करने  वाले   महान  योद्धा    तथा  जन भावना  को   स्वर  देने  वाले   विचार  क्रांति  के   महावीर  की  तरह   हमेशा  याद  रखेगा   l "   उनका  सम्पूर्ण  जीवन  जैसे  पुरातन  शास्त्रों   की  पवित्रता  की   सर्वाधिक  सटीक  और  सामयिक  व्याख्या  थी   l  

11 October 2017

WISDOM ------- जनचेतना ---- जन - सेना

  बात  उन  दिनों  की  है  जब  भारत  में  अंग्रेजों  का  शासन  था  l  प्रथम  विश्व युद्ध  जोरों  पर  था   और  अंग्रेजों  को  लड़ने  के  लिए  लाखों  सैनिकों  की  जरुरत  थी  l   उन्होंने  भारतीय  राजाओं  से   सेना  लेने  का  निश्चय  किया  l  इस  सिलसिले  में  उनका  प्रतिनिधि  ' रेजिडेंट '  जैसलमेर   राज्य  में  आया  l  वह  यहाँ  के  महाराजा  जवाहर  सिंह  के  नाम  वायसराय  का  पात्र  भी  लाया  था  , जिसमे  जैसलमेर  की  सेना  को   ब्रिटिश  सेना  में  शामिल  करने  का  अनुरोध  था  l  राजा  ने  रेजिडेंट  का  भव्य  स्वागत  किया  और  कहा  कि  जैसलमेर  राज्य  में  कोई  नियमित  सेना  नहीं  है , अत:  वे  उनकी  सेवा  में  सैनिक  देने  में  असमर्थ
 हैं  l   रेजिडेंट  हंसा  और  बोला  आप  हमें  बेवकूफ  नहीं  बना  सकते  ,  बिना  सेना  के  कोई  शासन  चलता  है  क्या  ? 
   राजा  ने  कहा ---- हमारी  आर्थिक  स्थिति  ऐसी  नहीं  है  कि  हम  सेना  का  बोझ  उठा  सकें  l  हमारी  जनता  ही  हमारी  सेना  है  ,  इसके  आत्मबल  से  ही  हम  हर  तरह  के  खतरे  का  मुकाबला  कर  सकते  हैं   l    अंग्रेज  रेजिडेंट  को  इन   बातों   का  जरा  भी  विश्वास  नहीं  हुआ ,  उसने  कहा  कि   यहाँ  की  आबादी  के  हिसाब  से   पांच  हजार  सैनिक  तो  साथ  ले  ही  जाने  हैं   l  महाराजा  ने  भी  समझा  कि  अब  बातों  से  काम  न  चलेगा  कुछ  करना  पड़ेगा  l  अत:  उन्होंने  कहा ,--- ठीक  है  l  कल  सुबह  आप  मेरी  सेना  देख  लेना  l  उसी   दिन  राजा  ने  अपने  घुड़सवार ,  ऊंट सवार  गाँव - गाँव  में  भेज  दिए  और  यह  कहलवा  दिया  कि   15  से  45  वर्ष  के  सभी  आदमी   सूरज  उगने  से  पहले  जैसलमेर  पहुँच  जाएँ   और  जिसके  पास  जो  भी  हथियार   है , साथ  लेता   आये  और   घोडा , ऊंट , बैलगाड़ी   जो  भी  वाहन  उपलब्ध  हो , लेकर  आये  l
  आदेश  हवा  के  साथ  सारे  राज्य  में   फैल   गया  l  खेत , खलिहान , मजदूर,  पत्थर  तोड़ता ,  गड्ढे  खोदता ---- जो  जैसा  था   तुरंत  शहर  की  ओर  रवाना  हो  गया   l
 अंग्रेज  रेजिडेंट  अपने  शयनकक्ष  में  सोया  हुआ  था  l    ऊंट ,  घोड़े  , बैलों  की  आवाजें ,  कण  फोड़  देने  वाला  शोर  सुनकर  उसकी  नींद  उचट  गई  , वह  उठ  कर  छत  पर  गया  l  वहां  राजा  पहले  से  ही  बैठे  थे  ,  उन्होंने  कहा  ,  आइये ,  देखो   यह  है  हमारी  सेना  l  रेजिडेंट  आँखे  फाड़  कर  देख  रहा  था  --- आसमान  तक  छाई  हुई  धूल  l   लोग  कमर  कसे    लाठी , डंडे ,  भाले ,  बंदूक,  तलवार , तीरकमान  लिए   आ  रहे  हैं  l  ऊंट , घोड़े , बैलगाड़ियों  का  हुजूम  हैं   l   महाराजा  ने  कहा  --- ये  है  हमारी  सेना ,  एक  रात  में  ही   ये  सभी  आ  पहुंचे  हैं  l   हम  सबको  अपनी  मिटटी  से  प्रेम  है  l  हमारी  स्वतंत्रता  पर  जब  आंच  आती  है  , तब  सारी  जनता  बलिदान  के  लिए  तुरंत  तैयार   है  l  जहाँ  जनता  बलिदान  देने  को  तैयार  हो  वहां  कौन  सा  खतरा  टिक  सकता  है   l   
  रेजिडेंट  आश्चर्य चकित  होकर  देखता  रह  गया   l  उसने  कहा   ऐसी  जन चेतना  जब   पूरे  भारत  की  राष्ट्रिय  चेतना  बन  जाएगी  तो  कोई  भी  विदेशी  ताकत   इसे  अपनी  गिरफ्त  में  नहीं  रख  सकेगी  और  तब  भारत  विश्व  का  सिरमौर  होगा  l   

10 October 2017

WISDOM ------- अन्यायी कितना ही बड़ा और शक्तिवान क्यों न हो ईश्वर उसके साथ नहीं होता l अत: उसे हारना ही पड़ता है l

  जब  तक  जी  सकते  हैं  शान  से  जियें ,  मनुष्य  की  गौरव  गरिमा  से  जियें  ,  अन्याय  से  संघर्ष  कर  के  जियें  l 
       महाभारत    युद्ध  के  दौरान   कर्ण  ने  भीष्म  से  पूछा ---- " आप  हम  सबके  पितामह   हैं  और  इसके  साथ  परशुराम  जी  के  शिष्य  हैं  l   मेरे  गुरुभाई  भी  हैं  l   ऐसा  क्यों  होता  है  कि  अर्जुन  से  अधिक  पराक्रमी  होने  के  बावजूद  ,  यह  विश्वास  मन  में  होते  हुए  भी   कि  मैं  युद्ध  में   उसे  हरा  दूंगा  ,     जब  भी  मैं   अर्जुन  के  समक्ष  होता  हूँ  ,   तब - तब  पराजय  का  भाव  मेरे  मन  में  आता  है   l "
     भीष्म  ने  कहा  ----- ऐसा  इसलिए  है  कर्ण  कि  तुम  जानते  हो  कि   तुम  गलत  हो  ,  वह  सही  है  l   तुम्हारे  अन्दर  अपराधबोध   है   l  उसी  का  बोझ    तुम्हारे  मन  पर  है   l    भावनाओं  का  अवरोध  ही    तुम्हारी  क्षमताओं  को   रोकता  है   l   तुम  विचारशील  होने  के  नाते   यह  भी  जानते  हो  कि   पांडवों  के  साथ  अन्याय  हो  रहा  है    और  तुम  अन्याय  के  पक्ष  में   खड़े  हो   |  तुम्हारा  अंतर्मन  बार - बार  हिचकता  है   l   कर्ण  !  तुम  अधर्म  के  साथ  खड़े  हो   l  "

9 October 2017

WISDOM ------ तृष्णा कभी शांत नहीं हो सकती , व्यक्ति इसके पीछे अपना अमूल्य जीवन गँवा देता है l

 आज  हर  कोई  धनवान  बनना  चाहता  है  l  जिसके  पास  जितना  है   वह  और  भी  अधिक  चाहता  है  और  इसके  लिए  दिन - रात  दुःखी   व  परेशान  रहता  है  l
    इस  संबंध  में  एक    प्राचीन   कथा  है -------  एक  साधारण  व्यापारी  था , जो  अपने  परिवार  के  साथ  सुखपूर्वक  रहता  था   किन्तु  वह  बहुत  अमीर  बनना  चाहता  था  , इस  कारण    अक्सर   चिंता  और  तनाव  में रहता  था  l  इसी  चिंता  में  वह   एक  बगीचे में    पेड़  के  नीचे  लेट  गया  ,  उसे  नींद  आ  गई  l    नींद  में   उसे  लगा  कि  कोई   उससे  कह  रहा  है ----- "जा  घर  लौट  जा  l  तेरे  घर  पर    अशरफियों  से  भरे  सात  घड़े  तेरा  इन्तजार  कर  रहे  हैं   l  "  उसकी  आँख  खुल  गई   और  वह  जल्दी - जल्दी  अपने  घर  की  ओर  चल  दिया   l  जब  उसने  घर  में  प्रवेश  किया  तो  देखकर  दंग  रह  गया  कि  सच  में  उसके  घर  सात  घड़े  रखे  थे   l  उसकी  ख़ुशी  का  ठिकाना  न  रहा  l  पत्नी  को  बुलाकर  सब  घड़े  खोल - खोलकर  देखने  लगा  l  छह  घड़े  सोने  की  अशरफियों  से  भरे  थे   और  सातवाँ  घड़ा  आधा  खाली  था  l
           अब  उसके  पास  इतना  धन  था  कि  सारा  जीवन  सुखपूर्वक  बिता  सकता  था  लेकिन  पति - पत्नी  यह  सोचकर  दुखी  थे  कि   इस  सातवें  घड़े  को  कैसे  भरा  जाये   ?  इस  चिंता  में  उन्होंने  हर  तरीके  से  धन  कमाना  शुरू  कर  दिया l  जो  कमाते  उससे  सोना  खरीद  कर  उस  घड़े  में  डालते  जाते  l  ऐसा  करते  हुए  कई  वर्ष  बीत  गए  ,  किन्तु  वह  घड़ा  तो  भरा  ही  नहीं  l   दोनों  इसी  दुःख  से  परेशान  कि  घड़ा  कैसे  भरें  l    एक  दिन  एक  साधु  उनके  घर  आया    और  उन  पति - पत्नी  को  चिंतित  देखकर  बोला --- " वह  सातवाँ  घड़ा  भरा  या  नहीं  ? "   वे  दोनों  आश्चर्य चकित ,  कि  साधु  कैसे  सब   जानता  है  l  साधु  बोला ----  बेटा !  यह  सातवाँ  घड़ा  तृष्णा  का  है ,  जो  कभी  पूरी  नहीं  होती  l  अधिक  तृष्णा  मन  को  व्याकुल  कर  देती  है   और  मनुष्य  उसी  तृष्णा  को   साथ  लिए  दुनिया  से  विदा  हो  जाता  है  l  l '  ऐसा  कहकर  वह  साधु  चला  गया  और  वह  सातों  घड़े  भी  साधु   जाते  ही  गायब  हो  गए   l   उन  दोनों  पति - पत्नी  को  बहुत  दुःख  हुआ    कि  जो  था  उसका  सदुपयोग  कर  लेते ,  अब    तो  पूरा  जीवन  ही  व्यर्थ  हो  गया  l
  '  धन  व्यक्ति  का  उद्धार  नहीं  कर  पाता,  मनुष्य  द्वारा  किये  गए  शुभ  कर्म  ही   उसकी  सहायता  करते  हैं  l '   

8 October 2017

WISDOM ------ सम्पति कमाना आसान है , लेकिन लोगों को प्रभावित करना , उनके दिलों को जीतना कठिन है

 अब्राहम  लिंकन  ने   एक  बार  अपने  एक  पत्र  की  शुरुआत  में  लिखा  था --- " हर  एक  को  तारीफ  अच्छी  लगती  है  l "
  हर  मनुष्य  के  दिल  की  गहराई  में   यह '  लालसा '  छिपी  होती  है  कि   उसे  सराहा  जाये  l    और  वह  दुर्लभ  व्यक्ति ,  जो   इस  ' लालसा '  को  संतुष्ट  करता  है  ,  लोगों  को  अपने  वश  में  कर  सकता  है   l
 चार्ल्स  श्वाब  एक  ऐसे  व्यक्ति  का  नाम  है  ,  जिसने  सहानुभूति  और  सच्ची  प्रशंसा   के  द्वारा  लोगों  के  दिलों  पर  राज  किया   l  एन्ड्रयु  कारनेगी  ने   चार्ल्स  श्वाब  को  एक  साल  में  दस  लाख  डालर   से  अधिक  की  तनख्वाह  दी  l  इसका  कारण  श्वाब  ने  बताया  कि   वे  लोगों  के  साथ  व्यवहार  करने  की  कला  में  निपुण  थे   l  श्वाब  का  कहना  था  कि   ---- " मैं  मानता  हूँ  कि  मेरी  सबसे  बड़ी  पूंजी   अपने  कर्मचारियों  का  उत्साह  बढ़ाने  की  कला  है   और  मैं   सराहना  और  प्रोत्साहन  के  द्वारा  लोगों  से  सर्वश्रेष्ठ  प्रदर्शन  करवा  लेता  हूँ  l "
       एन्ड्रयु  कारनेगी  गरीबी में  पले  स्काटलैंड  के  किशोर  थे  ,   जिन्होंने  अपनी  नौकरी  की  शुरुआत    दो  सेंट  प्रति  घंटे  काम  से  की  थी    और  बाद  में  उन्होंने    365  मिलियन  डॉलर   दान  में  दिए   l  उन्होंने  जीवन  की  शुरुआत  में  ही  सीख  लिया  था  कि   लोगों  को  प्रभावित  करने  का  इकलौता  तरीका   सामने  वाले  की   इच्छाओं  के  बारे  में  बात  करना  है   l  वे  केवल  चार  साल  तक  ही  स्कूल  गए  थे  , परन्तु  उन्होंने  यह   सीख  लिया  था   कि  लोगों  के  साथ किस  तरह व्यवहार  किया  जाये      l         "                                                                                                                                                                                                                                     

7 October 2017

WISDOM ------ आत्मविश्वास मानव जीवन की दृढ़ पतवार है जो उसे विषमताओं में गतिशील और सुस्थिर बनाये रखती है

   जीवन  में  प्रकाश  देने  वाले  सभी  दीप  बुझ  जाएँ , किन्तु  मनुष्य  के  अन्तर  में  अपने  विश्वास  की  ज्योति  जलती  रहे   तो  वह  गहन  अंधकार  में  भी   अपना  पथ  स्वयं  ढूंढ  निकालेगा  l 
  अहंकार     और     आत्मविश्वास  में  बड़ा  अंतर  है  l   अहंकार  का  आधार  भौतिक  पदार्थ  और  मनोविकार  होते  हैं   l  यह  शोषण ,  निर्दयता   और  पीड़ा  का  कारण  बनता  है   l  हिटलर , मुसोलिनी , तैमूरलंग, नादिरशाह  आदि  में  यही  था   जो  उनके  और  जन  समाज  के  लिए  अहितकर  सिद्ध  हुआ  l
                      ईश्वर  विश्वास  ही  आत्मविश्वास  है   l   आत्मविश्वास  की  इस  ज्योति  को  जलाने  और  प्रज्वलित  रखने  के  लिए   मनुष्य  का  अपने  विकारों ,  चिंता , भय  आदि  पर  नियंत्रण  जरुरी  है   l  यदि  मनुष्य  इन  विकारों  में  जकड़ा  हुआ  है  तो  वह  पराधीन  है ,   ऐसी  पराधीनता  में  आत्मविश्वास  नहीं  होता    l    जब  मनुष्य   अपने  मन   को  नियंत्रण  में  रखता  है   तभी  वह  आत्मविश्वास  की  शक्ति  को  पाता  है  और  इससे  मनुष्य  की  साधारण  शक्तियां   असाधारण  बन  जाती  हैं   l
   स्वामी  विवेकानन्द  ने   अपने  अनुभवों  के  आधार  पर  इसकी  महत्ता   बताते  हुए  श्री  ई. टी. स्टरडी  को  एक  पत्र  में  लिखा  था ---- " हमारे  गुरुदेव  के  शरीर  त्याग  के  बाद  हमलोग  बारह  निर्धन  और  अज्ञात  नवयुवक  थे  l  हमारे  विरुद्ध  अनेक  शक्तिशाली  संस्थाएं  थीं  जो  हमें  नष्ट  करने  का  भरसक  प्रयत्न  कर  रहीं  थीं  l  परन्तु  श्री  रामकृष्ण देव  ने  हम  सबके  भीतर   जो  आत्मविश्वास  की  ज्योति  जलाई  थी  उसके  प्रभाव  से   सारे  अंधकार  नष्ट  हो  गए   और  प्रभु    की    शिक्षाएं  दावानल  की  तरह  फैल   रही  हैं   l  "
       आत्मविश्वास  से बाधाएं  भी  मंजिल  पर  पहुँचने  वाली   सीढियाँ  बन  जाती  हैं   l   प्रसिद्ध  वैज्ञानिक    जगदीश  चन्द्र बसु   पौधों  में  जीवन  है  ,  इस  प्रतिपादन  को  इंग्लैंड  की  वैज्ञानिक  मंडली  के  सम्मुख  प्रयोग  द्वारा  सिद्ध  करने  जा  रहे  थे   l   कुछ  ईर्ष्यालु  लोगों  ने    तीक्षण  जहर  पोटेशियम  सायनाइड  की  जगह  सामान्य  चूर्ण  रख  दिया   l  चूर्ण  के  घोल  की  सुई  पौधे  में  इंजेक्ट  करने  पर   कोई  असर  नहीं  हुआ  ,  तब  उन्होंने  आत्मविश्वास  भरे  स्वर  में  कहा --- 'यदि  इससे  पौधा  नहीं  मरता  है   तो  मैं  भी  नहीं  मरूँगा   और  सारा  चूर्ण  खा  गए   l   ईर्ष्यालुओं  का   मुख  लज्जा  से  नत  हो  गया   l   असली  पोटेशियम  सायनाइड  लाया  गया   और  उन्होंने  सफल  प्रयोग  कर  के  दिखा  दिया   l 
   

6 October 2017

WISDOM ------ अच्छे स्वास्थ्य के लिए परिश्रम जरुरी है















एक  बार   कन्फ्यूशियस  के  शिष्य   चांग हो चांग  भ्रमण  के  लिए  निकले   l  मार्ग  में  उन्होंने  देखा  कि  एक   युवा  माली  कुंए  से  बालटी  से  पानी  निकाल कर   एक - एक  पौधे  में  डाल  रहा  है   l   उन्हें  दया  आई  और  ऐसी  व्यवस्था  करा  दी  कि   एक  जगह  खड़े  होकर  पानी  निकाल  ले  जो  नाली  की  सहायता  से  पेड़ों  में  पहुँच  जाये  l  ऐसी  व्यवस्था  से  माली  को  आराम  तो  हुआ  किन्तु  चलना - फिरना   व  झुकने  आदि  कई  व्यायाम  नही  हो  रहे  थे   l  चांग  एक  बार  फिर  उसी  रास्ते  से  गुजरे  तो  उन्होंने  सोचा  कि  कुएं  में  भाप  से  चलने  वाली  मशीन  डाल  दी  जाये   तो  परिश्रम  बहुत  कम  होगा  और  सब  पेड़ों  को  पानी  भी  मिल  जायेगा  l   यह  प्रस्ताव  भी  स्वीकार  हो  गया , भाप  का  इंजन  लग  गया  और  माली  को  बहुत  आराम  हो  गया  l  
बहुत  दिन  बीत  गए  चांग    की    उस  बगीचे  को  देखने  की  इच्छा  हुई   l  वहां  जाकर  देखा  तो  स्तब्ध  रह  गए  पूरा  बगीचा   सूख    चुका  था  l  माली  को  देखा  तो  उसके  हाथ  सूख  गए ,  टांगे  पतली  हो  गईं,  भोजन  हजम  नहीं  होता  , चेहरा  पीला  पड़  गया  l  चांग  ने  उससे  कहा --- क्या  अभी  भी  बहुत  परिश्रम  करना  पड़ता  है ,  कोई  और  तरकीब  सोचें  ?  
  माली    की    पत्नी  ने  हाथ  जोड़कर  कहा ---' आप  तरकीब  न  सोचें  ,  ऐसी  सलाह   आप  इन्हें   दें  कि     फिर  से  परिश्रम  करने  लगें  l  यह  आराम  ही  बीमारी  का  कारण  है  l ' 
  माली  अपनी  पूर्व  जीवन पद्धति  में  आकर  पुन:  स्वस्थ  हो  गया  l 
  चांग  अपने  एकांगी  चिंतन  पर  बहुत  पछताए  l  यह  समझ  गए  कि  बिना  परिश्रम  के  जीवन  मूल्यहीन  और  नाकारा  हो  जाता  है   l 




















5 October 2017

युवाओं के मार्गदर्शक ----- सुभाषचंद्र बोस

  घटना  उन  दिनों  की  है -----  सुभाषचंद्र  बोस  ने   20  सितम्बर  1920  को   इंग्लैंड  में  आई. सी. एस.  की  परीक्षा  में  सफलता  प्राप्त  की  थी  ,  सफल  छात्रों    की    सूची  में  उनका  स्थान  चौथा  था  l  अंग्रेजी  कम्पोजिशन  में  उन्हें  प्रथम  स्थान  मिला  था ,  उन्होंने  अंग्रेजों  को  उन्ही  की  भाषा  में  धूल  चटा  दी   l   इसके  कुछ  ही  महीनों  बाद  समाचार   पत्र    में   मुखर  पृष्ठ  पर   यह  समाचार   प्रकाशित   हुआ कि   -----
  'सुभाषचंद्र  बोस  ने   आई. सी. एस.  पद  से  त्यागपत्र  दे  दिया ,   22  अप्रैल  1921  का  यह  दिन   भारतीय  इतिहास  में  अमिट  हो  गया  ---  स्वतंत्र  और  सशक्त  भारत  के  निर्माण  के  लिए  उन्होंने  स्वयं  को  समर्पित  कर  दिया  ----------
       एक  अंग्रेज    पुलिस  अधिकारी    जो   सुभाषचंद्र  बोस  से  इंग्लैंड  के  दिनों  से  परिचित  था  ,  उसने  उनके  कमरे  में  प्रवेश  किया  और  कहा ---- ' मिस्टर  सुभाष  ! मेरे  पास  तुम्हारी  गिरफ्तारी  के  लिए  वारंट  है  l " इतना  कहकर  उसने  विचित्र  नजरों  से  उन्हें  देखा  और  कहा ---- " तुम  क्या  हो  सकते  थे  और  क्या  हो  गए   ? "    इस  अंग्रेज  अधिकारी  को  यह  मालूम  था  कि  यदि  आज  वह  आई. सी. एस.  अधिकारी  होते  तो  वह  उनका  अधीनस्थ  होता   l
      उस  अंग्रेज  की  इस  बात  के  उत्तर  में  उन्होंने  कहा ---  "  ठीक  कहा  तुमने  मिस्टर  ग्रिफिथ  !  मैं  गुलाम  हो  सकता  था  ,  लेकिन  आज  मैं  अपने  देश  की  स्वाधीनता  का  सजग   सिपाही  हूँ  l  '
 अंग्रेज  अधिकारी  ने  कहा --- ' मुझे  तुम्हारे  कमरे  की  तलाशी  लेनी  है  l '    वह  उनके  कमरे  कि  हर  चीज  को  बड़े  ध्यान  से  उलटता - पुलटता   रहा   ---- एक  पुस्तक  थी  जिसमे  स्वामी  विवेकानन्द  के  पत्रों  का  संकलन  था  ,  एक  चांदी  की  डिब्बी  में  कुछ  चूर्ण  जैसा  था ,  उसने  पूछा ---- " यह  क्या  है   मिस्टर  सुभाष  ? '  उत्तर  में  उन्होंने  कहा ----- "  यह  मेरे  देश  की  मिटटी  है ,  मैं  हर  रोज  इसकी  पूजा  करता  हूँ   इसे  अपने  माथे  पर  लगाता  हूँ   और  देश  की  स्वाधीनता  के   अपने  उद्देश्य  का  स्मरण  करता  हूँ   l  " 
  यह  बात   अंग्रेज  की  समझ  के  बाहर  थीं  l   उनके  चेहरे  पर  प्रसन्नता  के  भाव  देखकर  वह  बोला ---- " तुम्हे  गिरफ्तार  होने  का  जरा  भी  दुःख  नहीं  है  मिस्टर  सुभाष  ? "
  उत्तर  में  उन्होंने  कहा ---- " कष्ट  और  त्याग --- दोनों  स्वराज्य  की  नींव  हैं ,  मिस्टर ग्रिफिथ  l  यदि  देश  के   युवक  उसके  लिए  स्वयं  को  अर्पित  करने  के  लिए  तैयार  हों   तो  स्वतंत्रता  की  कल्पना  को  साकार  होने  में  देर  न  लगेगी  l  " 
  इस   गिरफ्तारी  के  बाद  उन्हें  बर्मा  की  मांडले  जेल  भेज  दिया  गया  l  जेल  की  यातनाएं  उनकी  साधनाओं  में  परिवर्तित  होने  लगीं  ,  यह  जेल  उनके  लिए  तपोभूमि  बन  गई   l   बीतते  समय  के  साथ  वे  सबके  प्रिय   महानायक   नेताजी  बन  गए  l
  भारत  के  युवाओं  ने    उनसे  कहा ---- " इस  विपदा  के  समय  में  जब  पूरा  देश  अंधकार  में  डूबा  है  ,  आपका  व्यक्तित्व   हम  सबके  लिए  प्रकाश  पुंज  है   l  "  नेताजी  सुभाषचंद्र  बोस  आज  भी  राष्ट्र  के  लिए  प्रेरणा  और  प्रकाश  का  अमर  स्रोत  हैं   l
      

2 October 2017

WISDOM ------ गांधीजी अहिंसा को कायरों का नहीं वीरों का भूषण कहा करते थे

 , अहिंसात्मक  प्रतिकार  से  उनका   आशय  था ---- बिना  किसी  को  कष्ट  दिए  ऐसा  नैतिक  दबाव  उत्पन्न  करना  कि  अत्याचारी  को  हारकर  सही  रास्ते  पर  आना  पड़े   l  इसके  लिए  बड़े  साहस ,  संतुलन  और  धैर्य  की  आवश्यकता  है   l
      घटना  1923    की    है  -----  तब  गुजरात  के  पंचमहल  एवं  गोधरा  में   भीषण  साम्प्रदायिक  उपद्रव  हुए  l  वहां  के  बहुसंख्यक  वर्ग  द्वारा  पीड़ित   व्यक्ति  भागकर   महात्मा  गाँधी  के  पास  पहुंचे   और  उन्होंने    अत्याचारियों    द्वारा  किये  गए  अत्याचार  की  शिकायत  उनसे  की   l  बापू  ने  सारी  बातें  ध्यानपूर्वक  सुनी    और  पूछा --- ' तुम  लोगों  ने  इसके  मुकाबले  क्या  किया   ? '
 आगंतुकों  में  से  एक  नेता  जैसे  व्यक्ति  ने  कहा --- '  करते  क्या  ?  आपकी  अहिंसा  का  अर्थ  सुनकर  ! '
 बापू   क्षुब्ध  मन  से  बोले ---- ' मेरी  अहिंसा  ने  यह  थोड़े  ही  कहा  था  कि  तुम  वहां  से   कायरों  की  तरह  भागकर   अपनी  बुजदिली  की   रिपोर्ट  देने  के  लिए  मेरे  पास  आओ  l  मेरी  अहिंसा  तो  साहसपूर्वक  मर - मिटने  का  सन्देश  देती  है  l  तुम  में  यदि  मर  मिटने  का  साहस  नहीं  था    तो  अपने  मन  के  अनुसार  उस  स्थिति  का  मुकाबला  करना  चाहिए  था  l   तुमने  मेरे  मत  को  समझा  नहीं  और  अपने  मत  पर  चलने  की  हिम्मत  नहीं  की  l    जहाँ  किसी  तरह  जान  बचा  लेने  की  भावना  है  ,  खतरों  से  मुंह  मोड़ने  या  भाग  जाने  की  संभावना  है  वहां  अहिंसा  नहीं  हो  सकती  l  अहिंसा   कायरों   की    नहीं   वीरों  की  है " l
        दुष्टता   या   अवांछनीयता    का  दमन  किसी  भी  प्रकार   किया  जाये  ,  ऐसा  ' मन्यु '     अहिंसा  के  अंतर्गत  ही  आता  है   l  क्योंकि    दुष्टों  का ,  अत्याचारी  का  दमन  करने  से   उसके  कारण  पीड़ित  होने  वाले   अधिक  लोगों  को  सुख - चैन  से  रहने  का  अवसर  मिलेगा   l 

1 October 2017

WISDOM ------ जब जागा आत्मबल ------

   विश्व  के  शक्ति भंडार  में  आत्मबल  सर्वोपरि  है  l   जो  अपने  मानवीय  विकारों  पर  नियंत्रण  रखता  है  ,  अपने  आंतरिक  और   बाह्य    जीवन  पर  शासन  करता  है    वही  आत्मबल  संपन्न  हो  जाता  है  और  तब  उस  पर  दैवी   अनुग्रह    अनायास  बरसता  है -------
       चन्द्रगुप्त  जब  विश्वविजय  की  योजना  सुनकर  सकपकाने  लगा   तो  चाणक्य  ने  कहा ----- "  तुम्हारी  दासीपुत्र  वाली  मनोदशा  को    मैं    जानता    हूँ   l   उससे  ऊपर  उठो   l  चाणक्य  के  वरद  पुत्र   जैसी  भूमिका  निभाओ  l  विजय  प्राप्त  कराने  की  जिम्मेदारी   तुम्हारी  नहीं ,  मेरी  है  l "
                     शिवाजी  जब  अपने  सैन्यबल  को  देखते  हुए  असमंजस  में  थे   कि  इतनी  बड़ी  लड़ाई  कैसे  लड़ी  जा  सकेगी  ,  तो  समर्थ  रामदास  ने  उन्हें  भवानी  के  हाथों   अक्षय  तलवार  दिलाई  थी    और  कहा  था ------- "तुम  छत्रपति  हो  गए ,  पराजय  की  बात  ही  मत  सोचो   l "
                     महाभारत  लड़ने  का  निश्चय  सुनकर  अर्जुन  सकपका  गया   और  कहने  लगा ----- "  मैं  अपने  गुजारे  के  लिए  तो  कुछ  भी  कर  लूँगा  ,  फिर  हे  केशव  !  आप  इस  घोर  युद्ध  में   मुझे  नियोजित  क्यों  कर  रहे  हैं  ? '  इसके  उत्तर  में  भगवान  ने  एक  ही  बात  कही ----    "  इन  कौरवों  को  तो  मैंने  पहले  ही   मार    कर   रख  दिया  है  l   तुझे  यदि  श्रेय  लेना  है    तो  आगे  आ ,  अन्यथा  तेरे  सहयोग  के  बिना  भी   वह  सब  हो  जायेगा ,  जो  होने  वाला  है   l   घाटे  में  तू  ही  रहेगा ---- श्रेय  गँवा  बैठेगा   और  उस  गौरव  से  भी  वंचित  रहेगा   ,  जो  विजेता  और  राजसिंहासन    के  रूप  में  मिला  करता  है   l  "
  अर्जुन  ने  वस्तुस्थिति  समझी   और   कहा कि  आपका  आदेश  मानूंगा   l 
    उच्चस्तरीय  प्रतिभाओं  का  पौरुष  जब  कार्यक्षेत्र  में  उतरता  है    तो  न  केवल  कुछ  व्यक्तियों   को ,  वरन  समूचे  वातावरण  को  ही  उलट - पुलट  कर  रख  देता  है   l 

30 September 2017

WISDOM

  आपत्तियों  का  कारन  है  ---- अधर्म  --- जब  मनुष्य  के  मन  में  सद्वृत्तियाँ  रहती  हैं  ,  तो  उनकी  सुगंध  से  दिव्यलोक  भरा - पूरा  रहता  है   और  जैसे  यज्ञ  की  सुगंध  से   अच्छी  वर्षा ,  अच्छा  अन्न  उत्पादन  होता  है  ,  वैसे  ही  जनता  की  सदभावनाओं   के  फलस्वरूप   ईश्वरीय   कृपा   की,  सुख - शांति    की    वर्षा  होती  है     l  यदि  लोगों  के  ह्रदय  छल कपट ,  द्वेष ,  छल  आदि   दुर्भावों  से    भरे   रहें  ,  तो  उनसे  अद्रश्य  लोक   एक  प्रकार  से   आध्यात्मिक    दुर्गन्ध  से    भर  जाते  हैं   l  जैसे   वायु  के  दूषित ,   दुर्गंधित   होने  से  हैजा  आदि  बीमारियाँ   फैलती  हैं   ,  वैसे  ही   पाप वृत्तियों  के  कारण  सूक्ष्म  लोकों  का  वातावरण    गन्दा  हो  जाने  से      युद्ध , महामारी  ,  दरिद्रता ,   अर्थ संकट ,  दैवी  प्रकोप  आदि    उपद्रवों  का   आविर्भाव     होता  है   l  

29 September 2017

शिक्षा - संत --------- स्वामी केशवानंद

   राजस्थान  प्रान्त  के  सीकर  जिले   के  मगलूणा  गाँव  में  एक  साधारण   किसान  परिवार  में  केशवानंद  का  जन्म  हुआ  ,  उनके  बचपन  का  नाम  ' वीरमा '  था  l  अपने  बचपन  और  किशोरावस्था  में  उन्होंने  गाँव  के  जीवन  का  दरद   और  बदहाली  देखी  l  उस  समय  गाँव  के  लोग   जागीरदारों - सामंतों ,  राजाओं - नवाबों  और  विदेशी  शासकों  की  तिहरी  गुलामी  में  जकड़े  थे  l  वीरमा   की    किशोरावस्था  राजस्थान  के  रेतीले  टीलों  के  बीच  लगभग  नंगे बदन  सरदी - गरमी  सब  कुछ  सहते  हुए  बीती  l   ऐसे  में  माता - पिता  भी  चल  बसे   l   तब  उन्हें   आर्य  अनाथालय  में  सहारा  मिला   l   पढने  की  लगन  में  उन्होंने  साधुवेश  धारण  किया  l    पंजाब  के  गुरु  कुशलदास   और  अवधूत  हीरानंद  के  संपर्क  में  आकर  ' केशवानंद '  बन  गए   l     फिर  तो  भारत  भर  के  तीर्थ  स्थानों , मंदिरों , मठों , शहर , गाँव , शिक्षण - संस्थानों ---- में  घूम - घूम  कर  दुनिया  की  पुस्तकें  पढ़  डालीं   l
     गुरु - सेवा ,  शिक्षण   और  भ्रमण  के  इस  अनुभव  में   उन्होंने  जाना  कि ----  व्यक्ति  का  जितना  शिक्षित  होना  जरुरी  है  ,  उससे  कहीं  अधिक  आवश्यक  है   जीवन  जीने  की  कला  का  अभ्यास  l  इसी  प्रयास  में  उन्होंने  राजस्थान , हरियाणा , पंजाब    में  प्राथमिक पाठ शालाएं ,  चल - पुस्तकालय , वाचनालय  आदि  स्थापित  और  संचालित   किये  l  उनके  द्वारा  स्थापित  संस्थाओं  में  सबसे  ज्यादा  नाम  व  चर्चा  ' ग्रामोत्थान  विद्दापीठ  सांगरिया  की  हुई   l   
    अनगिनत  संस्थाओं  के  संस्थापक    स्वामी  केशवानंद  अखण्ड   ज्योति  पत्रिका  एवं  इसके  संचालक  परम  पूज्य   गुरुदेव  पं.  श्रीराम  शर्मा    आचार्य   से   प्रेरणा  ग्रहण  करते  थे  l  वह  कहते  थे   अखण्ड   ज्योति  पत्रिका  में    प्रकाशित  जीवन  जीने  की  कला  आज  के  युग  की  ब्रह्म   विद्दा    है   l   इस  पत्रिका  में   प्रकाशित   अंशों   का  जिक्र    करते  हुए  कहते  थे  ---- "  जिन्दगी  जीना  एक  कला  है  l  यह  कला  तो  वास्तव  में  मानसिक  वृति  है  ,  जिसके  आधार  पर    साधनों  की  कमी  में  भी   जिन्दगी  को  खूबसूरती  के  साथ   जिया  जा  सकता  है   l   जिन्दगी  को  हर  समय  हंसी - खुशी  के  साथ   अग्रसर  करते  रहना  ही  कला  है   l  उसे  रो - पीटकर  काटना  ही     कलाहीनता  है   l   जो  जीवन  की  अनुकूलता  और  प्रतिकूलता   के  परिवर्तनों  का    समभाव  से  उपभोग   कर  लेता  है  , वही  कुशल  कलाकार  कहा  जायेगा   l 

28 September 2017

शहीद भगतसिंह ---- जिन्होंने आत्म बलिदान कर के क्रान्तिकारियों के कार्यों के पीछे जो गम्भीर विचारधारा और उच्च आदर्श था -- उसे संसार के सामने रखा

 ' नित्यप्रति  हजारों  मनुष्य  तरह - तरह  से  अकाल  मृत्यु  के  मुँह  में  चले  जाते  हैं  ,  पर  जो  भगतसिंह  की  तरह   दूसरों  के  लिए  जीवन  अर्पण  कर  देते  हैं   वही  इस  नश्वर  जगत  में  अमर  हो  जाते  हैं   l '  ऐसे  निर्भीक  और  कर्तव्यपरायण  युवकों  पर  भारतमाता  जितना  गर्व  करे  कम  है  l   
  उन्होंने   जीवन  के  अन्तिम  समय  तक  अन्याय  के  विरुद्ध  संघर्ष  किया  l ` 
            असेम्बली  बम  केस  में  अपने  कार्य  का  औचित्य  सिद्ध  करते  हुए   उन्होंने  कहा  था --- ' क्रान्ति  का  वास्तविक  मार्ग  मेहनत  पेशा  लोगों  को  जागृत  तथा   संगठित  करना  है  l  थोड़े  से  युवक  आतंकवादी  कार्य  कर  के   इस  महान  उद्देश्य  को  पूरा  नहीं  कर  सकते  l  यह  मेरा  दृढ़  विश्वास  है  कि  हमको  बमों  और  पिस्तौलों  से  लाभ  नहीं  होगा  l   ' ------
 उन्होंने  कहा ---- " समाज  में  सभी  के  लिए  अनाज  पैदा  करने  वाले   किसानों  के  परिवार  भूखों  मरते  हैं  ,  सारे  संसार  को  सूत  जुटाने  वाला   बुनकर  अपना  और  अपने  बच्चों  का  तन  ढकने  के  लिए  पर्याप्त  कपड़ा  नहीं  पाता  है  ,  शानदार  महल  खड़ा  करने  वाले  लुहार , बढ़ई,  कारीगर   झोंपड़ी  में  ही  बसर  करते   और  मर  जाते  हैं   और  दूसरी  तरफ  पूंजीपति  ,  शोषक  अपनी  सनक  पर  करोड़ों  रुपया  बहा  देते  हैं   l  l  समाज  में  एक  ऐसी  व्यवस्था  की  स्थापना  की  जाये   जिसमे  मजदूर  वर्ग  के  प्रभुत्व  को  मान्यता  दी  जाये   जिसके  फलस्वरूप  पूंजीवाद  के  बन्धनों ,  दुःखों   तथा  युद्धों  से  मानवता  का  उद्धार  हो  सके   l  "
     ' मृत्यु '  मानवमात्र  को  आतंकित  कर  देती  है   लेकिन  भगतसिंह  को  अंतिम  क्षण  तक   मृत्यु   की   भयंकरता    का  तनिक  भी  भय  नहीं  हुआ  l   मृत्यु  के  दिन  उनने  अपने  भाई  को  पत्र में  यह  अमर  वाक्य  लिखे  थे ----- "  एक  दीपक  की  लौ    की    तरह  मैं  सुबह  होने  से   पहले  ही  खत्म  हो  जाऊंगा  l  यह  मुट्ठी  भर  खाक  अगर  नष्ट  हो  जाये   तो  इससे    क्या  हानि   होगी  ? "  
  भगतसिंह  का   आत्मबलिदान   इतना  प्रभावशाली  सिद्ध  हुआ  कि  सर्वत्र  उनका  नाम  गूंजने  लगा  l   महात्मा  गाँधी  ने  कहा ---  "  हमारे  मस्तक  भगतसिंह  की  बहादुरी  और  बलिदान  के  समक्ष  झुक  जाते  हैं  l "   

27 September 2017

WISDOM

जो  लोग  वर्तमान  में  ही  भविष्य  की  तैयारी  नहीं  करते   वे  अदूरदर्शी  होते  हैं   और  एक  तरह  से  जीवन - पथ  पर  असफलता  के  बीज   बोने  जैसी   भूल  करते  हैं  l   समय  रहते  पहले  से  तैयारी  कर  लेने  पर  निर्धारित  योजनाओं  में   सौभाग्य  का  समावेश  होना  स्वाभाविक  ही  होता  है   l  असफलता  तो  उन  अदूरदर्शी  व्यक्तियों  को  मिलती  है   जो  तैयारी  के  समय   आलस्य  और  उपेक्षा  में  पड़े   सपने  देखा  करते  हैं   और  कर्तव्य काल  में   व्यस्तता , व्यग्रता ,  त्वरा  और   अव्यवस्था  के  शिकार  बनकर   शक्ति  तथा  संतुलन  को  जीर्ण - शीर्ण  करते  रहने   विवश  होते  हैं    l 

26 September 2017

धर्मप्राण - महामना पं. मदनमोहन मालवीयजी

  '  मालवीयजी  ने  हिन्दू  विश्वविद्यालय    की    सफलता   और  वहां  के  विद्दार्थियों  तथा  अध्यापकों    को  कर्तव्यपरायण   तथा  उन्नतिशील  बनाने  के  लिए   अपना  जीवन  ही  अर्पण  कर  दिया   l '
     मालवीयजी  केवल  लड़कों  की  शिक्षा    लिए  ही  प्रयत्नशील  नहीं  रहे   वरन  लड़कियों    की    शिक्षा   को  भी    वे  उतना  ही  आवश्यक   और  महत्वपूर्ण  समझते  थे   l  उन्होंने  हिन्दू विश्वविद्यालय  में  लड़कों   की शिक्षा   की   तरह  कन्या -  शिक्षा    की  भी  उचित  व्यवस्था     की  l  उस  समय  में  भी  उन्होंने  लड़कियों  को  वेद  पढ़ने  की  अनुमति  दी  l
  स्त्री - शिक्षा  के  महत्व  पर  उन्होंने  कहा  था ----- " हमारा  सच्चरित्र  होना , ब्रह्मचारी  बनना   अथवा  अन्धविश्वास  का  परित्याग  करना  तभी  हो  सकता  है   जब  हम  अपने  स्त्री - वर्ग   का  सुधार  कर   उसे  अपने  अनुकूल  बना  लें  l  जब  तक  हम  नारी - शक्ति  को  अपने   साथ  लेकर  नहीं  चलते , तब  तक  हम   कभी  जातीय - जीवन  की   लहलहाती  लता  को   देखकर  आनन्दित  नहीं  हो  सकते  l  क्योंकि  मनुष्य  समाज  का  कल्याण   अथवा  अकल्याण ,  उच्च  अथवा  नीच  होना   स्त्रियों  के  ही  हाथ  में  है   l ------ यदि  स्त्रियाँ  पुरुषों  के   साथ  रहकर  उनके  लाभ  अथवा  सुख  की  सहायक  न  हों  ,  तो  पुरुष  कभी  सुखी  अथवा  आनन्दित  नहीं  रह  सकते   l  पुरुषों  की  उन्नति  अथवा  अवनति  वास्तव  में  स्त्रियों  के  हाथ  में  है  l --------- स्त्रियों  को  ईश्वर  की  दी  हुई  विपुल  शक्ति  को   जीवन  के  उच्च  आदर्श  के   सामने  लाकर  सुगठित  करना   और  कर्मशील  बनाना  ही  हमारा  उद्देश्य  है   और  वही  हमारे  जातीय  जीवन  का   मूल  और  कर्तव्य - कर्म  है   l  " 

25 September 2017

पं . दीनदयाल उपाध्याय ----- निरंतर आत्मनिरीक्षण करते थे

 पं. दीनदयाल  उपाध्याय  राष्ट्रीय  स्वयं सेवक  संघ  के  कार्यकर्ताओं  के  साथ   मुंबई  से  नागपुर  तीसरे  दरजे  में  रेल  द्वारा   जा   रहे  थे  l  उन  दिनों  वे  भारतीय  जनसंघ  के  अध्यक्ष  थे   l  उसी  ट्रेन   की  प्रथम  श्रेणी  में   गुरु  गोलवरकर  जी   भी   जा  रहे  थे  l  उन्होंने  किसी  महत्वपूर्ण  विषय  पर   विचार - विमर्श    के  लिए  उपाध्याय  जी  को  अपने  पास  बुलाया  l  दो  स्टेशन  तक  उनका  प्रथम  श्रेणी  के  डिब्बे  में  ही  वार्तालाप  होता  रहा   l   अपने  डिब्बे  में  आने  के  बाद   वह  टी. टी.  को  खोजने  का  प्रयास   करने  लगे  और  हर  स्टेशन  पर  नीचे  उतर  कर  उसे  खोजते   l
  श्री  उपाध्याय जी  को  टी. टी.  की  खोज  करते  देख  उनके  साथी  यह  जानने  के  उत्सुक  थे  कि  आखिर  उन्हें  टी. टी.  से  क्या  काम  है  l  पंडितजी    की   दौड़ - धूप  का  प्रयास  सफल  हुआ   l  उन्हें  शीघ्र  ही  टी. टी.  सामने  आता  दिखाई  दिया  l
  दो स्टेशन  वे  वार्तालाप  हेतु  प्रथम  श्रेणी  में  बैठे  थे  , अत:  उन्होंने  उससे  अपना  अधिक  किराया  जमा  करने  को  कहा  l   उसे  बहुत  आश्चर्य  हुआ  किन्तु  उसने  चुपचाप  हिसाब  से  पैसे  ले  लिए  और  पूछा  --- "  क्या  आप  रसीद  भी  चाहते  हैं  ? "  पंडितजी  ने  कहा --- ' अवश्य  l '    बिना  रसीद  दिए  वह  राशि टी. टी.  स्वयं  ही  रखना  चाहता  था   किन्तु  उपध्याय जी  ने  कहा ----  "  मेरे  टिकट  के  पैसे  न  देने   और  टी. टी.  के  जेब  में  रख  लेने   के     दोनों  अपराध  समान  हैं  l  दोनों  से  ही  देश  खोखला  होता  है  l  "

24 September 2017

WISDOM ----- आप दूसरों से स्नेह , सम्मान और सहानुभूति चाहते हैं तो उनकी आलोचना , बुराई न करें

  यदि  किसी  के  मन  में  स्वयं  के  प्रति  विद्वेष  पैदा  करना  है  , जो  दशकों  तक  पलता  रहे  और  मौत  के  बाद  भी  बना  रहे  ,  तो  इसके  लिए   उसकी   कुछ  चुने  हुए  शब्दों  में   चुभती  हुई   आलोचना  करनी  होती  है  l  जाने - अनजाने  में  ज्यादातर  लोग  ऐसा  ही  करते  हैं   और  दूसरों  के  मन  में  खुद  के  लिए  विषबीज  बो  देते  हैं  l
              बॉब हूवर  एक  प्रसिद्ध  टेस्ट  पाइलट  थे  जो  एयर  शो  में  अक्सर  प्रदर्शन  किया  करते  थे  l  एक  बार  वे  सैनडीएगो   से  एयर  शो  में  हिस्सा  लेने  के  बाद  लास एंजिल्स  में  अपने  घर  को  लौट  रहे  थे  कि  अचानक  हवा  में  तीन  सौ  फीट  की  ऊंचाई  पर  उनके  हवाई  जहाज  के  दोनों  इंजन  बंद  हो  गए   l  कुशल  तकनीक  से  उन्होंने  जहाज  को   उतारा  l  हवाई  जहाज  का  तो  बहुत  नुकसान  हुआ  परन्तु  किसी  को  चोट  नहीं  आई   l  उन्होंने  हवाई  जहाज  के  ईंधन  कि  जाँच  की  तो  पाया  कि   द्वितीय  विश्व युद्ध  के  प्रसिद्ध  हवाई  जहाज  में  किसी  ने  गैसोलीन  कि  जगह  जेट  का  ईंधन  डाल  दिया   l
  उन्होंने  उस  मैकेनिक  को  बुलाया  जिसने  हवाई  जहाज   की    सर्विसिंग  की  थी    l  युवा  मैकेनिक   अपनी  गलती  पर  बहुत  शर्मिंदा  था   किन्तु   बॉब     हूवर   ने  उसे  कोई फटकार  नहीं  लगाई,  इसके   बजाय अपने   हाथ  उसके  कंधे  पर  रखकर  कहा ----- "  मुझे  पूरा  भरोसा  है  अब   तुम  दोबारा  ऐसा  नहीं  करोगे  l  मैं  चाहता  हूँ  कि  कल  तुम  मेरे   एफ--51  हवाई  जहाज  की  सर्विसिंग  करो   l  "
  उनके  इस  व्यवहार   से  उस  मैकेनिक   के  अन्दर  हूवर  के  प्रति   श्रद्धा - विश्वास  का  भाव  पनपा   और  फिर  कभी  भी   उसने  अपनी  पुरानी  गलती  नहीं  दोहराई  l
 लोगों   की   आलोचना  करने  के  बजाय  उन्हें  समझने    की    कोशिश  करनी  चाहिए   l                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         

23 September 2017

शब्दों की शक्ति बड़ी ताकतवर है -------- स्वामी दयानंद

  ' वार्तालाप  में  सत्यता , नम्रता   और  शिष्टता    का  अपना प्रभाव  है  और  कटुता   या  स्वार्थपूर्ण   वार्ता   का  अपना  l   परिशोधित - परिष्कृत  होने  पर   शब्द  अमृत  बन  सकते  हैं    और  विकृत  होने  पर   विष  का  भी  काम  कर  डालते  हैं   l '
                                                                                                                                                                                             घटना  उन  दिनों  कि  है    एक     नवयुवक  स्वामी  दयानंद  के  पास  पहुंचा  ,  उस  समय   स्वामीजी  नाम स्मरण  के  सन्दर्भ  में   उपस्थित  जन  समुदाय  के  समक्ष  भक्तियोग   का  उपदेश   दे   रहे  थे   l   वह  युवक  तार्किक  था      प्रवचन  के  बीच  में  ही  बोला ---" स्वामीजी  ! नाम स्मरण  से  क्या  फायदा ?  यह  शब्दों  का  जंजाल  है  ,  इससे  किसी  को  कोई फायदा नहो    l "
  स्वामी  दयानंद  ने  अपना    उपदेश  बीच  में  ही  रोका      और  उसे  समझाने के  लिए  जोर  से  बोले ---- " पागल  कहीं  का , जाने  क्या  बक  रहा  है  ?  जानता  भी  नहीं  है ,  अहंकार  इतना  बढ़ा - चढ़ा  है ,  जैसे  कोई  प्रकांड  पंडित  हो  l "
    स्वामीजी  के  इन   अपशब्दों  को  सुनकर  वह  युवक  तिलमिला  गया   और  कहने  लगा --- "  आप  एक  संन्यासी  हैं  पर  आपको  बोलने  का  ढंग  नहीं  आया  l "
  स्वामीजी  अब  बड़े  सहज  और  शांत  स्वर  में  बोले  ---- " अरे  भाई  ! मैंने  दो - चार  शब्द  ही  तो  बोले  हैं  , इससे  आपको  विशेष  चोट  पहुंची  क्या   ?  ये   कोरे  शब्द  हैं  , पत्थर  तो  नहीं  जिनसे  चोट  लगती   l  आप  स्वयं  कह  रहे  थे  नाम स्मरण    केवल  शब्द  आडम्बर  है  ,  इससे  कुछ  नहीं  होता  l " स्वामीजी  ने  कहा ---- आप  तनिक  गहराई  से  विचार  करें   जिस  प्रकार  बुरे  शब्दों    की   चोट  ने  आपको   घायल  किया  ,  उसी  प्रकार   भागवान  के  पवित्र नाम स्मरण से  सद्गुण  विकसित  होते  हैं  ,  दुःख -- दरद  के घाव  शीघ्र   भर  जाते  हैं  ---- संतप्त  मन  शांत  होता  है  l  '   स्वामी  दयानंद  का  उपदेश  सुनकर म वह  युवक  उनके  पैरों  पर  गिर  पड़ा    और  बोला  ---- गुरुदेव  l  आपके  कथन  से  मेरी  शंका  दूर  हुई  ,  मैं  समझ  गया  कि मन्त्र जप ,  नाम स्मरण , स्रोत पाठ  आदि  भाषा  का  विषय  नहीं  है  ,  वरन  व्यक्ति  के  अन्तराल  की   भाव - संवेदनाओं  को  जगाने  वाली   ऐसी  अलौकिक  शक्ति - सामर्थ्य  है  ,  जिसके  फलस्वरूप   अहंकार  एवं  अन्य  विकारों  को  विसर्जित  होने  में  जरा  भी  देर  नहीं  लगती   l  "                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  

22 September 2017

स्वतंत्रता आन्दोलन में अग्रणी ----- भगिनी निवेदिता

  निवेदिता  का  उदय  धार्मिक  पृष्ठभूमि  में  हुआ  था   l   उस  समय  आवश्यकता  इस  बात  कि  थी  कि   पहले  भारतीय  अपने  स्वाभिमान  को  समझें  ,  उनमे  शिक्षा  और  संस्कृति  का  विस्तार  हो  l  इसके  लिए  आवश्यक  था  कि भारत  स्वतंत्र  हो  l  अत:  भारतवर्ष  को   स्वतंत्र  कराना  ही  उस  समय  उनका  प्रमुख  उद्देश्य  बन  गया   l  उन्होंने  राजनीतिक  क्षेत्र  में  प्रवेश  किया  ,  स्वतंत्रता - आन्दोलन  में  भाग  लिया   l  अब  वह  पूरी   तौर  से   क्रांतिकारी  थीं  l    महर्षि  अरविन्द  ने  कहा  था -- वे  अग्निस्वरुपा  थीं   l  स्वामी  विवेकानन्द  ने  उन्हें  सिंहनी  बना  दिया  था   l   राष्ट्र निर्माण  हेतु   भारत    की    आजादी  के  समर्थन  में  वे  सतत  लिखती  रहती  थीं   l
  लार्ड  कर्जन  जो  बंग भंग  के  लिए  जिम्मेदार  थे  ,  उन  तक  शिकायत  पहुंची  कि  बेलूर  मठ  के  रामकृष्ण  मिशन  का  क्रांतिकारियों  से  सम्बन्ध  है   l  तत्कालीन  संचालक  मंडल  ने   निवेदिता  से  कहा  कि  लाट साहब  का  सन्देश  आ  रहा  है  कि  इस  मठ  को  समाप्त  कर  देना  है  ताकि  क्रांतिकारियों  का  गढ़  ही  समाप्त  हो  जाये   l  तब  निवेदिता  ने  लाटसाहब    की   पत्नी  को  समझाया  कि  यह  हमारे  गुरु  व  उनके  गुरु  का  मंदिर  है   l  यहाँ  क्रान्तिकारी  नहीं  हैं ,  यह  तो  मनुष्य  बनाने  का  तंत्र  है  l
  बंगभंग  आन्दोलन  में  उनने  खुलकर  भाग  लिया  , निवेदिता  का  निवास स्थान  क्रांतिकारियों  का  आश्रय  स्थान  बन  रहा  था  ,  क्रांतिकारियों  के   कारण  मठ   की    बदनामी  न  हो  ,  इस  कारण    अनेक  लोग  उनसे  रुष्ट  हो  गए  थे   l  पर  भगिनी  निवेदिता   की    यह  गुरु निष्ठा  थी  कि    उन्ही  ने  रामकृष्ण  मिशन   की ,  अपने  गुरु  के  मंदिर  की  रक्षा   की   l   वे  आंतरिक  रूप  से  योगिनी ,  साधिका  और  कल प्रेमी  थीं  ,  पर  प्रत्यक्ष  रूप  से  एक  योद्धा , भारत  प्रेमी  और  भारत    की    स्वतंत्रता  के  लिए  सतत  संघर्ष  करने  वाली  महिला  थीं   l   44 वर्ष  की  आयु  में  शरीर  छोड़  दिया  ,  पर  वे  इतिहास  में  गुरु - शिष्य  परम्परा  में  अमर  हो  गईं  l 

21 September 2017

महापुरुष लेनिन

 प्रसिद्ध  मानवतावादी  विचारक  रोमारोलां  ने  लिखा  है ---- " लेनिन  वर्तमान  शताब्दी  का   सबसे  बड़ा  कर्मठ   और  स्वार्थत्यागी  व्यक्ति  था  l  उसने  आजीवन  घोर  परिश्रम  किया  पर  अपने  लिए  कभी   किसी  प्रकार  के  लाभ   की   इच्छा  नहीं  की  l "
उस  समय  रूस  पर  जार  का  निरंकुश  शासन  था  l  लेनिन  के  प्रचार  कार्य  से    शोषण  और  अन्याय  के  प्रति   मजदूरों   में   असंतोष  भड़क  उठा   हड़ताल , प्रदर्शन  आदि  होने  लगे   और    सरकार    इनको  सीधी  तरह  नहीं  रोक  सकी  ,  तब  जार  के  सलाहकारों  ने  उसे  सलाह  दी  कि  श्रमजीवियों और  गरीबों  को  धर्म  के  नाम  पर  भड़का  कर   यहूदियों  से  लड़वा  देना  चाहिए  l    इससे  उनका  ध्यान  शासन  और  सरकारी  नियमों   की    बुराइयों   की    तरफ  से  हट  जायेगा  और  उधर  यहूदियों  का  भी  सफाया  हो  जायेगा  l  जार   के  ये  सलाहकार  कितने  निरंकुश  और  अत्याचारी  थे  इसका  नमूना  जार  के  प्रधान  मित्र  जनरल ट्रयोन  के  भाषण  के  एक  अंश  से  जाना  जा    सकता  है ------ "  वे  आन्दोलन  कि  बात  करते  हैं  ,  उनको  गोली  से उड़ा  दो  l  उनमे  थोड़े  से  पुलिस  के   भेड़ियों  को   नकली  क्रन्तिकारी  बनाकर  शामिल  कर  दो   और  वे  तुरंत  ही  -- तुम्हारे  जाल  में  फंस  जायेंगे   l  "    इस  योजना  के  अनुसार  निरंकुश  शासक  के  कार्यकर्ता  ईसाइयों  के  धर्म चिन्ह   उठाकर  ,  घंटा  बजाते  हुए  जुलूस  बनाकर  निकलते    और  गरीब  यहूदियों  के   घरों  में  घुसकर   उनके  तमाम  कुटुम्ब    की    हत्या  कर  डालते  ,  जो  कुछ  मिलता  उसे  लूट  लेते  l   दूध  पीते  बच्चे  और  स्त्रियाँ  भी  उनके  हाथों  से  नहीं  बच  सकती  थीं   l यद्दपि     ये  सरकारी  नौकर  नहीं  थे   तो  भी  जार  उनकी  प्रशंसा  करता  था   और  उन्हें     राजभक्त      बतलाता  था   l
          रुसी   क्रांति  को  लेनिन  ने  किस  प्रकार   अपना  सर्वस्व  होम  कर  खड़ा  किया  और  कार्यरूप  में  परिणित  हो  जाने  पर   किस  प्रकार  प्राणों   की    बाजी  लगाकर   उसकी  रक्षा   की ----- यह  रुसी  इतिहास   की    अमर  गाथा  है  l  शासन  सत्ता  ग्रहण  करने  के  कुछ  ही  दिन  बाद  जब  जर्मन  सेना  के  आक्रमण  से  रूस  की    रक्षा   की    समस्या  उपस्थित  हुई  ,  उस  समय   अन्य   नेता   तो  जर्मनी  से  सन्धि  कर  के  अपनी  पराजय  स्वीकार  करने  को   बहुत  बुरा बतलाते  थे  ,  पर  लेनिन  ने  कहा --- हमारी  क्रान्ति  जीवित  रहेगी   तो  हम  इस  वर्तमान  हानि  का  बदला  आगे  चलकर  चुका  लेंगे  l  पर  यदि   इस  समय  हम  बिना  तैयारी  के  शत्रु  से  भिड़  गए   तो  फिर  रक्षा  का  कोई उपाय  नहीं  है  l  इसके  लिए  लेनिन  ने  अपने  सिर  पर  जिम्मेदारी  ली  ,  रुसी  साम्राज्य  का  कुछ  हिस्सा  जो  जर्मनी  कि  सीमा  से  लगा  था   उसको  दे  दिया  और  जर्मनी  के खतरे  से  बचने  के  लिए   अपनी  राजधानी       पैट्रगार्ड  से  मास्को  ले  गए  l   इस   कारण  बहुत  से  साथी  उनके  विरोधी  बन  गए  ,  पर  अंत  में  लेनिन   की    सच्चाई  और  उचित  निर्णय  के  लिए  सबको  उसके  सामने  नतमस्तक  होना  पड़ा   l
     कई  पूंजीवादी   नेताओं  ने  भी   लेनिन  के  असाधारण  गुणों   की  चर्चा   करते  हुए  कहा  है ----- "  यद्दपि  लेनिन  का  मार्ग  हमसे  भिन्न  था   तो  भी  इसमें  संदेह  नहीं  कि   उसकी  राजनीतिज्ञता ,  दृढ़  निश्चय ,  और  अगाध  ज्ञान  की   तुलना  मिल  सकना  कठिन  है   l  "

19 September 2017

बंग्ला भाषा की प्राण - प्रतिष्ठा की ----- श्री बंकिमचन्द्र

  जिस  समय  बंकिम बाबू  ( जन्म  1838 )   सरकारी  नौकरी  में  प्रविष्ट  हुए  , उन  दिनों   बंग्ला  भाषा   की   दशा  बहुत  दयनीय  थी   l  उस  समय  उन्होंने  महसूस  किया  कि   अपनी  शक्ति  का  उपयोग   मातृभाषा   को  उन्नत  बनाने के  लिए  कर  के   उसे   सभ्य   भाषाओं   कि  पंक्ति  में  खड़े  होने  योग्य  बनाया  जाये  l
  वे  अपना  समस्त  निजी  कार्य  बंग्ला  में  ही  करने  लगे   l  बंगाल  के  विद्वान  और  देशभक्त  श्री  रमेश चन्द्र  दत्त  को  वे  ही   बंग - साहित्य    की  सेवा  में  लाये   l
  साहित्य  प्रचार  और  नए  लेखकों  को  प्रोत्साहन  देने  के  लिए  उन्होंने  ' बंग दर्शन  मासिक  पत्रिका  प्रकाशित  करना  शुरू  किया    l  उनका  पहला     उपन्यास  था  ' दुर्गेशनंदिनी '  और  दूसरा था  ' कपाल कुण्डला '  l  जिस  उपन्यास  के  कारण  उनका  नाम   देशभक्तों  में  अमर  हो  गया ,  वह  है ---- 'आनंदमठ  '  इसी  में  सबसे  पहले  ' वंदेमातरम् '  शब्द  और  उसका  गीत  लिखा  गया    l 

18 September 2017

WISDOM ------- अहंकार एक भ्रम है

  अहंकार  व्यक्ति  के  अन्दर  तब  उत्पन्न  होता  है  , जब  वह  स्वयं  को  श्रेष्ठ  समझने  लगता  है   और  यह  मानने  लगता  है  कि  दुनिया  उसके  इशारों  पर  चल  रही  है  l अहंकारी  व्यक्ति  को  स्वयं  पर  इतना  घमंड  हो  जाता  है  कि   वह  स्वयं  को  दुनिया  से  अलग  ,  सबसे  विशिष्ट  व्यक्ति  समझने  लगता  है   l  अपने  इस  अहंकार  के  कारण  वह  दूसरों  से  अच्छा  व्यवहार  नहीं  करता ,  उन  पर  अधिकार  जमाना  चाहता  है      अहंकार  व्यक्ति  को  किस  दिशा  में  ले  जाता  है ,  इस  सम्बन्ध  में  एक  सच्ची  घटना  है -------
       दक्षिण  में  मोरोजी  पन्त  नामक  एक  बहुत  बड़े  विद्वान  थे  l  उनको  अपनी  विद्दा  का  बहुत  अभिमान  था   और  सबको  नीचा  दिखाते  रहते  थे  l  एक  दिन  कि  बात  है  वे  दोपहर  के  समय  अपने  घर  से  स्नान  करने  के  लिए  नदी  पर  जा  रहे  थे  l  मार्ग  में  एक  पेड़  पर  दो  ब्रह्म राक्षस  बैठे  थे   वे  आपस में  बात  कर  रहे  थे  l  एक  ब्रह्म राक्षस  बोला --- " हम  दोनों  तो  इस  पेड़   की  दो  डालियों  पर  बैठे  हैं  ,  पर  यह  तीसरी  डाली  खाली  है  , इस  पर  बैठने  के  लिए  कौन  आएगा  ? "  तो  दूसरा  ब्रह्म राक्षस  बोला ---- " यह  जो  नीचे  से  जा  रहा  है  न , वह  यहाँ  आकर  बैठेगा  , क्योंकि  इसको  अपनी  विद्वता  का  बहुत  अभिमान   है  l "   उन  दोनों  के  संवाद  को  मोरोजी  पन्त  ने  सुना  तो  वे  वहीँ  रुक  गए  और  सोचने  लगे  कि  विद्दा  के  अभिमान  के  कारण  मुझे  प्रेतयोनि  में  जाना  पड़ेगा  ,  अपनी  होने  वाली  इस  दुर्गति  से  वे  घबरा  गए   और  मन  ही  मन  संत  ज्ञानेश्वर  के  प्रति  शरणागत  होकर  बोले   -- "  मैं  आपकी  शरण  में  हूँ ,  आपके  सिवाय  मुझे  बचाने  वाला   कोई  नहीं  है   l  "  ऐसा  सोचते  हुए  वह  आलंदी   की    तरफ  चल  पड़े   l  आलंदी  में  संत  ज्ञानेश्वर  ने  समाधि  ली  थी  l  संत   की    शरण  में   जाने  से   उनका  अभिमान  नष्ट  हो  गया  और  संत  कृपा  से  वे  भी एक  संत  बन  गए  l 

17 September 2017

सेवा - परायण , आदर्शों के धनी ------ दीनबन्धु एंड्रयूज

   श्री  एंड्रयूज  कहा  करते  थे  ---- " बुराइयाँ  हैं ,  आदमी  और  समाज  बुरा  है  ,  इसका  रोना - रोने  कि  जगह  यदि  उनको  परिवर्तित  करने  , नए  ढंग  से  गढ़ने ,  नया  रूप  देने   के  प्रयत्न  में  जुट  पड़ा  जाये   तो  एक  बस्ती  हो  क्यों    पूरे  समाज  का  कायाकल्प  संभव  है   l '
  सी.  एफ.  एंड्र्यज   ने  केम्ब्रिज  विश्वविद्यालय  से  अपनी  शिक्षा  समाप्त  करने  के  बाद  समाज - सेवा  को  अपना  कार्य  क्षेत्र  चुना   और  लन्दन  के  ' वालवर्थ ' नामक  कसबे  में  रहने   गए  l  इस  कस्बे  के  निवासियों  का  जीवन  पतित  था   l  चोरी , जेबकटी  से  अपनी  रोटी -रोजी  चलाते  थे  l  शराब , जुआघर  आदि  के  कारण   बस्ती  बदनाम  थी    l   इस  शिक्षित  युवक  एंड्र्यज   को  वे  आश्चर्य  से  देख  रहे  थे  ,  बस्ती  के  लोग  उन  पर  हँसते , मजाक  उड़ाते   l  श्री  एंड्र्यज  ने   उनके  बच्चों  को  शिक्षा  व   सुसंस्कार  देना  और  माताओं  को  स्वास्थ्य  सम्बन्धी  जानकारी  देने  का  क्रम  शुरू  किया   l   धीरे - धीरे    बस्ती  के  निवासियों   का  उन  पर  विश्वास  बढ़ता  गया   कि  कोई  है  जो  उनके  बच्चों  के  कल्याण  का  ध्यान  रखता  है  l     श्री  एंड्रयूज  लोगों  को  चरित्र - निष्ठा   की    गरिमा  समझाते  और  कहते   कि  रविवासरीय  कक्षा  में  अवश्य  आयें , सप्ताह  में   कम  से  कम  रविवार  को  गलत  काम  न  करें  l
    एक  दिन   बस्ती  के  युवकों  ने  श्री  एंड्रयूज  के  साथ  तीन -चार  दिन  का  पिकनिक  का  कार्यक्रम  बनाया   यह  तय   किया   गया  कि  इन  तीन - चार  दिनों  में  कोई  चोरी , बदमाशी  नहीं  करेगा  l   उन  लोगों   की    जिन्दगी  में  यह  पहला  अवसर  था  जब  चार  दिन  बिना  अपराध  के  कटे  l
  इसके  बाद   परिवर्तन  शुरू  हो  गया  l  अपराध  कि  जगह  लोगों  ने  श्रम  को  अपनाया  l  कुछ  सेना में  भरती  हुए  कुछ  मिलों  में  l  धीरे - धीरे  पूरी  बस्ती  का  कायाकल्प  हो  गया    l
  ' एक  व्यक्ति  के  प्रभावकारी  व्यक्तित्व  ने  यह   प्रमाणित  कर   दिया  कि ---- ' प्रभावकारी  व्यक्तित्व   से  एक    बस्ती  तो  क्या  पुरे  समाज    का  कायाकल्प  संभव  है   l '

16 September 2017

न्याय - व्यवस्था

' दुनिया  वालों  के  न्याय  में   भले  ही  चूक  हो  जाये   पर  ऊपर वाले  का  न्याय  कभी  नहीं  चूकता  l  भरोसा  रखना  चाहिए --- देर  भले  ही  हो ,  पर  जीतती  सच्चाई  ही  है  l  '

  यूनान  का  राजा  फिलिप   अपनी  न्यायप्रियता  के  लिए  प्रसिद्ध  था  l  वह  अपने  दरबार  में  स्वयं  ही  सारे  मुकदमे  सुनकर  उनका  न्याय  किया  करता  था  l  एक  बार  राज्य  के  दो  नागरिक  उनके  सम्मुख  अपना  मुकदमा  लेकर  पहुंचे  l  राजा  फिलिप  उस  दिन  बेहद  थके  हुए  थे  l  जब  पहला  व्यक्ति  अपना  पक्ष  सुना  रहा  था   तो  उन्हें  हलकी  सी  झपकी  आ  गई  l  जब  उन्हें  चैतन्यता  आई ,  तब  तक  दूसरे  पक्ष   की   बारी  आ  गई   l  उन्होंने  दूसरे  पक्ष  के  बयान  को  ही  सम्पूर्ण  सच  मानकर  उसी  के  पक्ष  में  निर्णय  सुना  दिया   निर्णय  सुनने  पर  पहले  पक्ष  का  व्यक्ति  बोला  --- " महाराज  ! आपका  निर्णय  न्यायपूर्ण  नहीं  है  l  मैं  चाहता  हूँ  कि  आप  मेरा  बयान  दुबारा  सुने  ,  क्योंकि  मेरा  बयान  सुनते  समय  आपको  नींद  आ  गई  थी   मेरा  पक्ष  सुनने  के  बाद  आप  जो  भी  निर्णय  करेंगे  वह  मुझे  स्वीकार  होगा  l "
  उस  व्यक्ति  का  बयान  सुनने  के  बाद   राजा   फिलिप   को  अपनी  गलती  का  एहसास  हुआ  और  उन्होंने  उसे  उस  पर  लगे  आरोपों  से  बरी  कर  दिया  l  इसके  बाद  वे  उससे  बोले  --- " मैं  तुम्हारे साहस  से  अत्यंत  प्रभावित  हूँ  l  तुम्हारे  साहस  ने  ही  तुम्हे  आज  न्याय  दिलाया  है   और  मुझे  एक  गलत  निर्णय  लेने  से  बचाया  है  l  हर  नागरिक  का  कर्तव्य  है  कि  वह  राजा  को  ऐसी  गलती  करने  से  रोके  ,  ताकि  राजपद  कि  गरिमा  अक्षुण्ण  रहे   l  "