21 May 2018

WISDOM ------ अन्याय चाहे घर में हो या बाहर उसका विरोध करने से डरना नहीं चाहिए और कुछ न कर सके तो भी बुराई के साथ सहयोग तो करना ही नहीं चाहिए ------- हेनरी थोरो

   थोरो  ने  कहा  था ---- " लोकतंत्र  पर  मेरी  आस्था  है  ,  पर  वोटों  से  चुने  गए  व्यक्ति   स्वेच्छाचार  करें   मैं  यह  कभी  बर्दाश्त  नहीं  कर  सकता   l  राज  संचालन  उन  व्यक्तियों  के  हाथ  में  होना  चाहिए   जिनमे  मनुष्य  मात्र  के  कल्याण  की  भावना  और  कर्तव्य - परायणता  विद्दमान  हो  और  जो  उसकी  पूर्ति  के  लिए  त्याग  भी  कर  सकते  हों  l 
  किसी  ने  कहा  ---- " यदि  ऐसा  न  हुआ  तो  ? "
  थोरो  का  कहना  था ---- "  तो  उस  राजसत्ता  के  साथ   हम  कभी  भी  सहयोग  नहीं  करेंगे   चाहे  उसमे  हमें  कितना  ही  कष्ट  क्यों  न  उठाना  पड़े   l "  इसके  लिए  उन्होंने  जो  कदम  उठाया   वह  विध्वंसात्मक  नहीं    लोकतान्त्रिक  था   l   ' सविनय  असहयोग  के  तत्वदर्शन   की  शक्ति  को   सबने  जाना  l  महात्मा  गाँधी  ने  यह  मन्त्र  उन्ही  से  पाया   जिसके  सामने  ब्रिटिश  सामंतशाही   को  झुकना  पड़ा  l  

17 May 2018

राजा महेंद्र प्रताप --- ' प्रेम - धर्म के प्रचारक और अनुयायी '

   राजा  महेंद्र  प्रताप  ने   1916  में   ' प्रेम  धर्म  '  पर  एक  पुस्तक  लिखी  थी   जिसमे  उन्होंने  राजनीति  पर  भी  अपने  विचार  दिए   l  उन्ही  के  शब्दों  में ---- "  सरकार  चाहे  छोटी  हो  या  बड़ी  उसे  अपने  क्षेत्र  में  शान्ति  बनाये  रखनी  चाहिए  l  पर  इसके  विपरीत  इस  जमाने  की  सरकारें   शांति  को  सबसे  अधिक  भंग  करने  वाली  हैं  l   वे  बड़े  चोरों  और  डाकुओं  की  तरह  काम  करती  हैं   और  पड़ोसियों  के  क्षेत्र  में  जबरदस्ती  घुसने    प्रयास  करती  हैं  l  "  राजा  महेंद्र  प्रताप  ने  आगे  लिखा  है ---- " मेरे  ख्याल  से  इसका  कारण  यह  है    कि   सार्वजनिक  शिक्षा    प्रणाली  की  खराबी  से  बहुत   सी  दूषित  मनोवृति  के  व्यक्ति  शासन  के   सर्वोच्च   पदों  तक  पहुँच  जाते  हैं   और  अपनी  शक्ति  का  दुरूपयोग  करते  हैं  l  वे  राष्ट्र  के  कर्णधार  संचालक  बनकर   अपने  समस्त  अनुयायिओं  को  लुटेरों  के  एक  दल  की   तरह  बना  देते  हैं   कि l  मेरा  मत  है   कि  सबसे  पहले  तो  हम   सर्वोत्कृष्ट  व्यक्तियों  को  ही   शासनकर्ता    और  राजनीतिक  कार्यकर्ता  के  पद  पर  नियुक्त  करें  l  वे  न  तो  धन  इकठ्ठा  करें  ,  न  जायदाद  रखें   l  उनका  एकमात्र  उद्देश्य   मानव जाति  की  सेवा  करना  ही  हो   l  वे  सदैव  मानव  जाति  को  सुखी  बनाने    प्रयत्न  करते
  रहें  l   "   उनका  विचार  था  कि  जिन  व्यक्तियों  को  प्रकृति    की  तरफ  से   या  सामाजिक  प्रयत्नों   से   श्रेष्ठ    शक्तियां  प्राप्त  हुई  हैं  ,  उनका  कर्तव्य  है  कि  वे  मनुष्य  जाति  की  भलाई  के  लिए  विशेष  रूप  से  सेवा  कार्य  करें   l 

16 May 2018

WISDOM ---- राजनीति में धन को स्थान मिल जाने से प्रजातंत्र का महत्व नहीं रहा

 धन  के  कारण  प्रजातंत्र  के सिद्धांतों  की  दुर्दशा  होती  है  ,  चुनाव  सम्बन्धी  नैतिक  सिद्धांतों  की  रक्षा  का  तो  प्रश्न  ही  नहीं  उठता  l 
  राजनीतिक  जीवन  में  सत्य  का  व्यवहार   महात्मा  गाँधी  में   पाया  जाता  था   और  इसी  के  कारण   वे  25  वर्षों  तक  इस  हलचल पूर्ण  क्षेत्र  में  टिके  रहे  और  अपने  नाम  को  अमर  कर  गए   l   राजनीति  में  धूर्तता , बहानेबाजी , असत्य  वादा  करना , रंग  बदल  लेना   आदि  चलता  है  लेकिन  ये  कार्य  निम्न  स्तर  के  और  तत्काल  लाभ  उठा  लेने  वाले  लोगों  के  ही  माने  जा  सकते  हैं   l  ऐसे  व्यक्ति  स्वार्थ  साधन  अवश्य  कर  लेते  हैं   पर  कोई  बड़ा  और  स्थायी  काम  उनके  बूते  का  नहीं  l
  लिंकन   राजनीति   में  भी  अपनी  आत्मा  के  आदेश  का  ध्यान  रखकर  सच्चाई  के  सिद्धांत  का  पालन  करते  थे   l   इस  कारण    इतने  वर्ष  बीत  जाने  पर  भी   उनका  सबसे  अधिक  सम्मान  है  l   इन  दोनों  महामानवों  में  यह  सत्य   और  आत्मशक्ति  का  ही  प्रभाव  था   जिसने  उन्हें  अमर  कर  दिया  l  

15 May 2018

WISDOM ------ अच्छी तरह जाने बिना किसी के सम्बन्ध में कोई धारणा बना लेना बहुत बड़ा अन्याय है

 डॉ.  राजेन्द्र प्रसाद   का   सादगी  का  जीवन  था  , उन  सादे  कपड़ों  में  भी  उनके  चेहरे  पर  एक   अनोखा  तेज  था ,  आकर्षण  था ,  जो  देखता  था  उनकी  तरफ  खिंचा  जाता  था  l   जब  वे  6-7  वर्ष  के  थे   तब  उनको   पढ़ने  के  लिए  गाँव  के  ' मकतब '  में  भेजा  गया  जहाँ  एक  बुड्ढे  मौलवी  उन्हें  पढ़ाया  करते  थे  l  राजेन्द्र  बाबू  ने  अपनी  आत्मकथा  में  लिखा  है  -- " मौलवी  साहब  बहुत  अच्छे  आदमी  थे  l '  इसी  प्रकार  वकालत  की  परीक्षा  में  प्रथम  वर्ष  में  उत्तीर्ण  हो  जाने  पर   उसकी  व्यावहारिक  शिक्षा  के  लिए   वे  सैयद  शम्सुल  हुदा  के  शागिर्द  बने  और  उन्ही  के  यहाँ  रहते  थे  l   उनकी  प्रशंसा  करते  हुए  राजेन्द्र  बाबू  ने  लिखा  है ----- " एक  बार  बकरीद  के  अवसर  पर   मैं  यह  समझकर  कई  उनके  यहाँ  इस  अवसर  पर  गाय  की  कुर्बानी  होती  है  ,  अपने  गाँव  को  चला  गया   और  दो - तीन  दिन  बाद  वापस  आया  l  वकील  साहब  ने  मेरे  चले  जाने  का  कारण  पूछा   और  जब  उनको   मेरे  उत्तर  से  संतोष  नहीं  हुआ   तो  स्वयं  ही  असली  कारण  को  समझ  लिया   और  कहने  लगे  --- "  मैं  समझ  गया  कि  तुम  बकरीद  के  कारण  चले  गए  l  तुमने  सोचा  कि  यहाँ  गाय की  कुर्बानी  होगी  इसलिए  इस  समय  यहाँ  नहीं  रहना  चाहिए  l  लेकिन  ऐसा  ख्याल  कर  के  क्या  तुमने  मेरे  साथ  बेइन्साफी  नहीं  की  ?  तुमने  कैसे  समझ  लिया  कि  मैं  तुम्हारी  भावनाओं  का  आदर  नहीं  करूँगा   ?  तुम  तो  खास  आदमी  हो ,   मेरे  बगीचे  का  माली ,  गाय  की  देखरेख  करने  वाला  सब  हिन्दू  हैं   l  क्या  उनका  दिल  नहीं  दुखेगा  ?   मेरे  घर  में  कभी  गाय  की  कुर्बानी  नहीं  होती  l  "
  डॉ.  राजेन्द्र  प्रसाद  ने  अपनी  आत्मकथा  में  लिखा  है  --- "  मुझे  अपनी  गलती  पर  बहुत  दुःख  हुआ  और  शिक्षा  मिली  कि अच्छी  तरह  जाने  बिना  किसी  के  सम्बन्ध  में  कोई  धारणा  बना  लेना  बहुत  बड़ा  अन्याय  है  l   "    सज्जन  और  बुरे  लोग  हर  समाज  में  होते  हैं  l  जाति  या  धर्म  के  कारण  किसी  को  बुरा  या  भला   नहीं  समझा  जा  सकता  है   l   

9 May 2018

WISDOM -------- राजा हो या प्रजा , चिरस्थायी कल्याण और जीवन के सार्थक होने का एकमात्र मार्ग स्वार्थ का त्याग और कर्तव्यनिष्ठा है

  ' संसार  में  केवल  सफलता  को  ही  सम्मान  नहीं  मिलता  बल्कि  उससे  भी  ज्यादा  मान्यता   किसी  ऊँचे  आदर्श  के  लिए  त्याग , बलिदान  और  समर्पण  की भावनाओं  को  दी  जाती  है   l  महाराणा  प्रताप  में  ये  गुण   इतने  अधिक  मात्रा  में  थे  कि  अनेक  लेखकों  ने   उनके  जन्म  को  किसी  महान  दैवी - विधान  का  अंग  मान  लिया  है   l  '
राणा  प्रताप  ने  जातीय  सम्मान  और  कर्तव्य निष्ठा  के  क्षेत्र  में  जो  आदर्श उपस्थित किया  उसका प्रभाव  बहुत  समय  तक  जनमानस  पर पड़ता  रहा  l 

8 May 2018

WISDOM ----- महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर केवल कवि और कलाकार ही नहीं थे , वे एक सच्चे कर्मयोगी थे

 महात्मा  गाँधी  के  अहिंसा  के  विचार  को  वे  पसंद  करते  थे    किन्तु  जब  उन्होंने  असहयोग   की  घोषणा  कर  के   लड़कों  को  स्कूल  और  कॉलेज  छोड़ने  को  कहा  , विलायती  कपड़ों  की  होली  जलाने  का  कार्यक्रम  आरम्भ  किया   तो  महाकवि  ने  उसका  विरोध  किया   l  वे  कहते  थे  कि  इस  प्रकार  लड़कों  को  भड़काने  से  वे  आवारा  बन  जायेंगे   l  वस्त्र  बहिष्कार  और  चरखा  के  सम्बन्ध  में  वे  कहते  थे ----- "  गांधीजी  मशीनों  के  खिलाफ  हैं  तो  मेरी  भी   वही   सम्मति  है   पर  हमारी  बुराइयों  की  जड़  तो  भीतरी  कमजोरी  है    l  हम   चलने ,  बोलने   और  हंसने  में  भी  डरते  हैं   l  अंग्रेज  सरकार  के  हुक्म  पर  उठते  बैठते  हैं   l  हमारी  अपनी  ताकत  कुछ  भी  नहीं   l  हम  कायर  हैं  ,  सरकार  से  हर  बात  में  डरते  रहते  हैं   l  इस  जबरदस्ती  के  मैं  विरुद्ध  हूँ   l  लोगों  के  विचारों  पर  नियंत्रण   ठीक  नहीं  है   l  इस  तरह  यदि  हमको  स्वतंत्रता  मिल  भी  जाएगी    तो  भी  हम  सच्चे  अर्थों  में  स्वतंत्र  न  हो  सकेंगे    l  "

4 May 2018

WISDOM ---- क्रांति उनका धर्म था किन्तु उन्होंने साधन और साध्य की पवित्रता पर जोर दिया ----

 प्रिंस  क्रोपाटकिन   जीवन  भर  अन्याय  से  लड़ते  रहे  l   क्रांति  उनका  धर्म  था   लेकिन  उन्होंने  सदा  ही  साधन  और  साध्य  की  पवित्रता  पर  जोर  दिया   और  अपनी  कलम  और  वाणी  के  माध्यम  से   उन्होंने  ऐसी  ही  पद्धतियों  का  प्रचार  किया   जो  मानवता  से  सीधा  सम्बन्ध  रखती  थीं  l 
  प्रिंस  क्रोपाटकिन   का  जन्म  रूस  के  एक  कुलीन  राजवंशीय  परिवार  में  हुआ  था   l  उन्होंने  सैनिक   स्कूल   में  शिक्षा  प्राप्त  की  l  एक  बार  जब  वे  गवर्नर  जनरल   के ए.डी. सी.  बन कर  साइबेरिया  गए   वहां  उन्होंने  जार  के  कोपभाजन  बने  लोगों  के  नारकीय  जीवन  को  देखा   तो  उनका  ह्रदय  विद्रोह  से  भर  गया  और  उन्होंने  तुरंत  शासकीय  सेवा  से  त्यागपत्र  दे  दिया   l   उन्होंने  निरंकुश  जारशाही  के  विरुद्ध  आवाज  उठाई  l   अब  क्रांति  ही  उनका  धर्म  था  l  उनके  जीवन  चरित्र  लेखक  मेरी  गोल्ड  स्मिथ  ने  लिखा  है  ---- " भले  ही  प्रत्येक  ईमानदार  और  उत्साही  व्यक्ति  के  प्रति  उनका  व्यवहार  उदारता पूर्ण  रहा  हो   लेकिन  साधनों  का  चुनाव  करते  समय  वे   बहुत  कठोर  हो  जाया  करते  थे  l  प्रचार  के  कुछ  ढंगों  को  क्रोपाटकिन  असह्य  मानते  थे   l  चाहे  जैसे  भले - बुरे  साधनों  द्वारा  अपने  लक्ष्य  की  प्राप्ति  के  सिद्धांत  से  उन्हें  नफरत  थी   l  चाहे  संगठन  का  काम  हो , चंदा  इकठ्ठा  करने  का  ,  विरोधियों  से   व्यवहार  करना  हो  या  दूसरी  पार्टियों  से  सम्बन्ध  बनाना  ,  किसी  भी  काम  में   अनुचित  साधनों  का  प्रयोग   वे  किसी  भी  दशा  में  सहन  नहीं  कर  सकते  थे  l  "